Friday, 1 December 2017

अम्बु

एकदम शांत पड़ी हुई ,जैसे किसी की जरुरत हो,
बिलकुल ठहरी हुई किसी के इंतज़ार में
हर थोड़े पल पे अपनी काया को टटोली हुई
जैसे की वो किसी के साथ नाचना चाहती हो
गाना चाहती हो
और फिर उसपे ही झर जाना चाहती हो
हर बार काया पे एक नयी उमंग थी
चेहरे पे ही मुस्कान नहीं बल्कि पूरी काया ही मुस्कुरा रही थी
मुस्कराहट भी ऐसी की बस अब जोर से हसने को तैयार
अपने साथी के साथ
वो चाहती थी उसके प्यास को बुझाना
ऐसे की वो उसको अपने होठो पे सजा ले
फिर उसकी रूह में उतर कर कुछ पलो के लिए उसमे समाई रहे
बिलकुल स्थिर बनी हुई बस मचलने को तैयार
बस थोड़ी सी छेड़खानी के इंतज़ार में
पूरी भरी हुई
सारे रंगो को अपने में समाने के लिए तैयार
सारे रूपों में अर्जित होने को तैयार
हर अंग पे अपनी पहचान छोड़ने को तैयार
उछल कर उसपे फूटने को तैयार
उस भरी धुप में भी देर तक उसको भिगोये रखने को तैयार
हर मचलती गर्माहट को बिलकुल ठंडा करने को तैयार
बिलकुल शांत डोलते हुए खड़ी थी
ये थी अम्बु (पानी) |

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