Friday, 15 December 2017

ओखी

अचानक से जोर की आहट हुई
जोर किसकी ?
नहीं पता बस आहट थी
जैसे हवाओ ने उसका साथ देने का फैसला कर लिया हो
जैसे पेड़ो ने न चल पाने की जिद को छोड़ अपने पैर जमीं से उखाड़ने की जिद पे हो
पेड़ो के पत्ते उनके संदेशो को उनके आका तक पहुंचाने के लिए दौड़ लगा लिया हो
गर्जना उठ रही थी लेकिन इस बार आकाश से नहीं बल्कि जमी से थी
रेतो ने हवाओ के पीछे चलने का आदेश मान लिया था
जैसे किसी ने उसके रंग रूप का मजाक उड़ा दिया था
उसने सारे रंगो को अपने में समाने के लिए चल दिया था
हर तरफ से रंगो को छींन कर
मिट्टी को हुकम था की अपनी खुश्बू को दूर दूर तक जोरो पर फैला दो
चिडियो को दूर तलक तक इंसानो तक खबर पहुंचाने का दंड था
दंड जैसा क्योकि प्यारी चहचहाहट नहीं बल्कि घोर व्याकुल आवाज थी उनकी
हवाओ को अपनी रफ़्तार की सिमा को बढ़ाये रखने का आदेश था
वायुदेव को अपने काबू  में कर के अपनी रफ़्तार को बढ़ाते जा रहा था
एक गहरे कुए की आकृति बनाते हुए
उस कुए की दीवारे थी अम्बु
लेकिन
योद्धाओं की तलवार की धार से भी तेज
उस कुए की खासियत थी की इसकी ऊंचाई और गहराई बढ़ती जा रही थी
और ये कुआ चलता कुआ था
और दहारता कुआ
अपने मार्ग में आने वाले सारे अलग अलग रंगो वाले हर चीज को अपने कुए में भरते हुए
आगे बढ़ रहा था
जैसे किसी युद्ध पे निकला हो
राजा के आने की खबर को
हवाओ और अँधियो ने अगुवाई करते हुए अगले साम्राज्य तक पहुंचने का काम ले रखा था
रफ़्तार इतनी नुकीली की
आहट का पता नहीं चल पा रहा था
बस रंगो को अपने कुए में भरते हुए तेज गर्जना के साथ आगे बढ़ रहा था
दिशाओ से लेकर आकाश तक सब हाथ जोड़े विनम्रता का आग्रह किये हुए सर
झुकाये हुए थे
लेकिन यहाँ रहम और शांति की कोई गुंजाईश नहीं थी
बस जब तक दर्द था ये बिकराल रूप देखना था
ये बिकराल रूप था
" ओखी " का !






                                                (ओखी- चक्रवात का एक रूप )


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